
बाबू स्वर्गीय लक्ष्मण महतो एक छोटे-मोटे जमींदार व्यक्ति थे। इनका जन्म १९४० ई० में दरभंगा जिले (बिहार) के जाले थानान्तर्गत ग्राम पंचायत राज मस्सा ग्राम में हुए थे। इनके पिताजी का नाम स्वर्गीय मंगल महतो थे जो एक ईमानदार एवं सात्विक प्रवृति के थे। बाबू लक्ष्मण महतो दो भाई थे। दुसरे छोटे भाई का नाम स्वर्गीय रामखेलावन महतो था। वे दोनों राम-लक्ष्मण के समान शांतिप्रिय एवं स्वाभिमानी थे। इनके दादाजी का नाम पूरन महतो थे। बाबू पूरन महतो के समय में लगभग १० बीघा जमीन था। उसी जमीन से अन्न पैदा कर अपना जीवन वसर करते थे। एक साधारण किसान की तरह अपनी जिन्दगी एवं परिवार के साथ रहते थे। उस ज़माने में ब्रिटिश का शासन था। उस समय भारत एक अविकसित देश था। शरीर में पहनने के लिए न अच्छा कपड़ा थे और न कपड़ा धोने के लिए कोई साबुन का अविष्कार नहीं हुआ था। लोग उस समय कपड़ा धोने के लिए उँस जो की बालू के समान था जिसका प्रयोग करते थे तथा कपड़ा पीट-पीट कर साफ करते थे। ग्राम की महिला गरीब या अमीर एक ही दाम के साड़ी पहनती थी जिसका नाम 'मार्किन' था। उस समय में परिवार में शिक्षा की बहुत कमी थी। घर के गार्डियन लोग शिक्षा पर ध्यान न देकर अपनी खेती पर अवाल्वित थे। ब्रिटिश शासन के समय स्वंतंत्रता आन्दोलन के समय 'सक्रिय' भाग लिए थे लेकिन रजिस्टर्ड स्वंतंत्रता सेनानी नहीं बन सके।बाबू लक्ष्मण महतो एवं छोटे भाई जब युवावस्था में आये तब आर्थिक समस्या को दूर करने के लिए चिंतन करने लगें। ये दोनों बही ग्राम के मोलाना हाफिज़ के यहाँ बचपन से ही पढ़ना शुरू किया। उस समय शिक्षक की कमी थी। हाफिज़ साहब के मरने वक्त तक वे दोनों भाई प्रत्येक साल गुरु दक्षिणा के रूप में उनको घर उपहार स्वरूप सामान भेजते थे और उसके बदले में वे भी बेर बड़ा-बड़ा फल अपने गाछ का तोडा हुआ भेजते थे। यह सब मेने देखा है। युवावस्था प्राप्त होने के बाद रोजगार हेतु रजिस्ट्री ऑफिस के मुंशी बने जिसको हिंदी में 'कातिब' और अंग्रेजी 'Deed writer' कहते हैं।
दोनों भाई को पेशा में काफी...
कमतौल एवं बेनीपट्टी रजिस्ट्री ऑफिस में इन दोनों भाई का पेशा में काफी इजाफा हुआ याने की खूब कमाई की जिससे रुपये का भरमार हो गया। काफी कमाई के कारन दोनों भाई अपने ग्राम में जमीन खरीदना शुरू किया। उस समय में जमीन खरीदने वालों की कमी थी कियोंकि पैसे का अभाव था। इसलिए जो भी जमीन बेचता था वह उनके यहाँ आता था और जमीन का बातचीत कर लेता था। उसके बाद रजिस्ट्री हो जाता था। आजकल कातिब के जैसा उस समय इतना कातिब नहीं था। वे दोनों भाई सीनियर कातिब कहलाते थे। आधा छेत्र छोटे भाई कब्ज़ा किये हुए थे। ये दोनों भाई ६५ प्रतिशद दस्ताबेज उर्दू में एवं २५ प्रतिशद हिंदी (कैथी) में लिखते थे। उन दोनों भाई का लिखा हुआ उर्दू आजकल मुसलमान भी नहीं पढ़ पते है। रुपये की अधिकता कमाई होने पर २० बीघा का प्लाट एक बार खरीदते थे। रुपया हो जाने के बाद अगल-बगल के ब्रामण, राजपूत एवं भूमिहार लोग दोस्त होने लगे तथा इनकी ख्याति भी बढ़ गयी। कोई समस्या उपस्थिति होने पर इनके दोस्त लोग भरपूर मदद करते थे और ये भी समय आने पर मदद करते थे। युवावस्था प्राप्त होने के बाद रूपये का अभाव नहीं रहने पर कुछ शोंकिन काम करने लगे। चढने के लिए घोड़ा खरीदे। उस घोड़े पर चढ़कर कमतौल ऑफिस जाते थे। घोड़ा को देखभाल के लिए एक नोकर की नियुक्ति थे। घोड़ा के बाद हाथी खरीदने पर विचार किये थे। लेकिन मेरे बाबूजी स्वर्गीय रामवतार प्रसाद असामयिक डेथ के कारण सारा प्लान रुक गया। रामवतार प्रसाद १९४६ ईसवी में किसी बीमारी से मर गए जिससे सारे परिवार में शोक छा गया। मै उस समय सिर्फ एक साल का बच्चा था जैसा की लोग कहते हैं।
मै दूसरी शादी नहीं करुँगी। मेरा एक लड़का है...
पिताजी के डेथ के बाद मेरे पास सबकुछ रहते हुए भी दादाजी अपने को अनाथ महसूस करने लगे। पुतोह यानि मेरी माँ को ध्यान बाँटने के लिए सोने का कंगन एवं सीकरी सब बना दी। अपनी पुतोह को युवावस्थ में विधवा होना उनके दिल में अपार दुःख हुआ। दादाजी को यह सन्देश हो गया की कंही यहाँ न रहकर अपने नैहर चला जाये तथा उसकी माँ-बाप कहीं दूसरी शादी न कर दे। इसलिए मेरी माँ से दादाजी के आदेशानुसार किसी औरत ने मेरी माँ से दूसरी शादी के बारे में पूछा तथा यह भी कहा गया की मेरे चाचाजी श्री विन्देश्वर प्रसाद से दुसरी शादी कर ले। लेकिन मेरी माँ एस बात से सहमत नहीं हुई और उसने दो शब्दों में बोली की मै शादी नहीं करुँगी। मेरा एक लड़का है मै उसी को देखकर अपनी जिन्दगी इसी घर में जीऊँगी। दादाजी का संदेह दूर हो गया। उस समय में १० बीघा से ५० बीघा जमीन बना लिए थे। जमीन हो जाने के कारण एक तोजी का जमींदार हो गए तथा रसीद भी लक्ष्मण महतो के नाम से कटने लगा।
अपने इतिहास को यादगार बनाने के लिए एक मंदिर बनाने की इच्छा...
१९५० इस्वी० के बाद दादाजी को एक मंदिर बनाने की इच्छा हुई। उक्त विचार को छोटे भाई के यहाँ प्रस्ताव लाये। छोटे भाई को यह बात पसंद नहीं हुआ फिर भी बड़े भाई की इच्छा को तोरना नहीं चाहते थे। अंत में, उन्होंने स्वीकृति प्रदान कर दी। मंदिर निर्माण में ६५ परसेंट छोटे दादाजी तथा जमीन खरीदने में भी ६५ परसेंट उनका ही खर्च हुआ। १९५४ ई० में मंदिर बन कर तैयार हो गया। इस इतिहास को यादगार के रूप में रखा जायेगा।
मंदिर के साथ पोखरा में घाट एवं मंडप का निर्माण किया गया। मंदिर में राम जानकी, लक्ष्मण एवं बजरंगबली की स्थापना गाजे-बजे, पंडितो एवं समाज के बड़ी भीर के बीच हुई। उस समय में मूर्ति का कीमत मात्र चार हजार रुपया था जो की संगमरमर का है। अभी भी उसी अवस्था में मूर्थी है। खंडन के सभी फरीकैन लोग शामिल जमीन में से ६ बीघा जमीन मंदिर में अर्पण कर चुके है। राम-जानकी के मंदिर के मालिक सेबायत के रूप में बाबू लक्ष्मण महतो के नाम से लिखा गया जिसकी रसीद अभी भी कटती है। इसका विवरण मंदिर के ऊपर के भाग में लिखा हुआ है। उन दोनों भाइयों के मरने के बाद नोकर पुजारी का आभाव हो गया। बहुत प्रयास करने के बाद कोई ब्राहमण पुजारी मिला जो एक महीने में १० दिन ही रहता था बाकि समय अपना घर चला जाता था। यह सब मुझे अच्चा नहीं लगता था। नियमित श्रद्धा से पूजन में आभाव होने लगा। यह सब देखर खुद ही पुजारी बन बैठा जो फ़िलहाल में ही हूँ। पुराने पुजारी को सारा जमीन देना चाह और मंदिर का कार्य भर समय-समय पर झुला श्रावण में गायक को मंगाया जाता है और उत्सव मनाया जाता है।
गंदे राजनीती का सामना करना पड़ा...
सन १९५२ से क्रमश मस्सा पंचायत के जनता के समूह अपना हाथ उठाकर किसी एक के पक्ष में बोलते समय में मुखिया पद पर रहकर जनता का कार्य किया जिससे जनता खुश था। उस समय में आज के जैसा पंचायत का कार्य बहुत कम था। सुखा हो जाने पर जनेश का दाना रहत में आता था और जनता के बीच वितरण होता था। दुसरे मुल्क से खजूर फल वितरण के रूप में आता था।
अपने मुखिया पद पर रहने के समय में ग्रामीण के गंदे राजनीती का सामना करना पड़ा। कभी फसाद के कारण उलझन में पर जाते थे। वे स्वाविमानी व्यक्ति थे किसी का रोब बर्दास्त नहीं होता था। अकारण इनको फसकर केस कर देता था जिसका सामना उन्हें करना पड़ता था। और अंत में जीत भी हो जाती थी। अपने खंडन के कुछ चचेरे भाई का आचरण ठीक नहीं था जिसके चलते ही इनको पग-पग पर बाधा उपस्थित होता था और उन्हें झेलना पड़ता था। आज भी उनके वंशज मेरे साथ बाधा उपस्थित करते है। आज भी वह खून आज के वंशज में दौर रहा है। समाज के कुछ लोग ईर्ष्यावश हमलोगों पद पर बना रहना अपने को अपमान समझते थे। जिसके चलते बराबर केस में फंसा देते थे। कभी मारने की दमकी देते थे मगर वे स्वाभिमानी व्यक्ति रोब को बर्दास्त नहीं करते थे और डटकर सामना करते थे और अंत में जीत भी हो जाती थी।
- श्री जयनंदन कुमार के कलम से